69000 शिक्षक भर्ती: 'न्याय का कत्ल' या सुशासन का असली चेहरा?
जब कलम चलाने वाले हाथ लाठियां खाने को मजबूर हों, तो समझ लेना कि 'सिंहासन' बहरा हो चुका है!
उत्तर प्रदेश के शैक्षिक इतिहास में **69000 सहायक अध्यापक भर्ती** एक ऐसा नासूर बन चुकी है, जिसकी टीस हर उस युवा के सीने में है जिसने योग्यता को अपना हथियार बनाया था। 2018 में शुरू हुआ यह सफर 2026 में भी अधूरा है। यह भर्ती केवल नौकरी देने का जरिया नहीं थी, बल्कि यह **आरक्षण की डकैती**, **अधिकारियों की तानाशाही** और **सरकार की वादाखिलाफी** का एक ऐसा दस्तावेज है जिसे इतिहास कभी माफ नहीं करेगा।
1. विज्ञापन की 'माया' और गुणांक का 'जाल'
भर्ती की शुरुआत से ही मंशा साफ थी—"भर्ती को इतना उलझा दो कि युवा कोर्ट के चक्कर काटते-काटते बूढ़ा हो जाए।"
- नियमों का खेल: परीक्षा के बाद रातों-रात कटऑफ बदलना। योग्यता की नई परिभाषाएं गढ़ना।
- गुणणांक की साजिश: 10% एकेडमिक और 60% Super TET का ऐसा कॉम्बिनेशन बनाया गया जिसमें हेरफेर की गुंजाइश अंत तक बनी रही।
हैरानी की बात देखिए, TET/CTET जैसी कठिन परीक्षाओं को पास करने वाले युवाओं को सरकार ने 'अपात्र' घोषित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया, लेकिन अपनी कमियां सुधारने के लिए एक कदम नहीं उठाया।
2. आरक्षण का 'महा-घोटाला': पिछड़ों के पेट पर लात
संवैधानिक रूप से पिछड़ों को मिलने वाला **27% (OBC)** और दलितों का **21% (SC)** आरक्षण इस भर्ती में अधिकारियों की कलम की भेंट चढ़ गया।
लगभग 19,000 सीटों का हेरफेर! वह सीटें जो पिछड़ों और दलितों के घरों में चिराग जला सकती थीं, उन्हें सत्ता के गलियारों में 'मैनेज' कर लिया गया।
MRC: आरक्षण खत्म करने का आधुनिक हथियार
मेरिटोरियस रिजर्व्ड कैंडिडेट (MRC) के नियमों का ऐसा गला घोंटा गया कि जो पिछड़ा जनरल की मेरिट में आया, उसे उसकी अपनी कैटेगरी में ही दबा दिया गया। यह आरक्षण देने की नहीं, बल्कि आरक्षण को जड़ से खत्म करने की एक सोची-समझी साजिश थी।
3. 6800 की सूची: जब सरकार ने अपना ही 'पाप' स्वीकार किया
5 जनवरी 2022 की तारीख कोई नहीं भूल सकता। चुनाव सिर पर थे, और आंदोलन की आंच लखनऊ से दिल्ली तक पहुँच चुकी थी। तब सरकार ने अचानक स्वीकार किया कि—"हाँ, हमसे गलती हुई है।"
"अगर घोटाला नहीं हुआ था, तो यह 6800 की नई लिस्ट कहाँ से टपकी? क्या यह लिस्ट आसमान से आई थी? नहीं, यह उस चोरी का सबूत थी जिसे सरकार ने खुद कबूला, लेकिन सुधारने की नीयत आज भी शून्य है।"
आज 2026 है, उन 6800 चयनितों के पास केवल एक कागज का टुकड़ा है, नियुक्ति पत्र नहीं। सरकार ने उन्हें 'लिस्ट' तो दी, लेकिन 'हक' छीन लिया।
4. सुप्रीम कोर्ट में 'मजाक': तारीख पे तारीख, सरकार गायब!
हाई कोर्ट की डबल बेंच ने 13 अगस्त 2024 को फटकार लगाते हुए पूरी लिस्ट रिविजिट करने को कहा। सरकार को लगा कि अब पोल खुल जाएगी, तो वह मामला सुप्रीम कोर्ट ले गई।
सरकार कोर्ट में पक्ष रखने के बजाय 'समय' मांगकर भाग रही है। यह 'भगोड़ा' रवैया साबित करता है कि सरकार के पास पिछड़ों के सवालों का कोई जवाब नहीं है। वह चाहती है कि यह भर्ती कोर्ट की फाइलों में ही दम तोड़ दे।
5. दमन का दौर: लाठियां, जेल और आंसू
लखनऊ के ईको गार्डन में धूप, बरसात और कड़ाके की ठंड में बैठे अभ्यर्थियों को न्याय के बदले क्या मिला?
- पुलिसिया बर्बरता: शांतिपूर्ण मार्च कर रही बहनों के कपड़े फाड़े गए, भाइयों के सिर फोड़े गए।
- फर्जी मुकदमे: हक मांगने वालों को अपराधी की तरह जेल में डालने की कोशिश की गई।
- मानसिक प्रताड़ना: कई अभ्यर्थियों ने आर्थिक तंगी और डिप्रेशन के चलते दम तोड़ दिया। उनकी हत्या का जिम्मेदार कौन?
6. हमारी मांग: खैरात नहीं, हक चाहिए!
अब समय आ गया है कि सरकार अपनी 'कुंभकर्णी नींद' से जागे। अभ्यर्थियों की मांगें स्पष्ट हैं:
- समायोजन (Adjustment): किसी कार्यरत शिक्षक को छेड़े बिना, रिक्त पदों पर उन सभी 19,000+ पीड़ित अभ्यर्थियों का समायोजन किया जाए जिनके साथ आरक्षण का खिलवाड़ हुआ है।
- याची लाभ: सालों से लड़ रहे योद्धाओं को न्याय मिले।
- सफेद झूठ बंद हो: सुप्रीम कोर्ट में सरकार बहानेबाजी छोड़ कर हलफनामा दे और नियुक्ति का रास्ता साफ करे।
प्रस्तुतकर्ता: कृतिका साइबर कैफे (युवाओं की आवाज) | संपर्क: सत्य और न्याय

